Sunday, August 25, 2013

सपने और अपने

कभी वो नज़रें चुराके हमें आंसुओं से भिगोते हैं ,
कभी अपना दामन चुराके हमें बारिश से भिगोते हैं !

हम तो उनकी यादों के समंदर में न जाने ,
खाते कितने गोते हैं !

खुली आँखों से देखके उनके ख्वाब ,
कभी जागते हैं कभी सोते हैं !

कभी नन्ही आस को उम्मीद के दरिये में डुबोते हैं
और कभी नन्हे सपनों को कोशिशों के बाग़ में बोते हैं !

सारी ख्वाइशों को टूटे खिलोनों सा संजोते हैं
और अपनी बाजुओं की मिटटी के दम में जोते हैं !

चाहत के रंगों से भरे आईने को सच्चाई के पानी से धोते हैं।,
और फिर कड़ी मेहनत की धूप में सुखोते हैं

तुम्हे शायद लगेगा की हम भी तनहाइयों में रोते हैं ,
सपनों के लिए न जाने कितने लोग अपनों को खोते हैं !

पर सच तो ये है ए बेवफा अपने हमेशा सपनों से बड़े होते हैं
अपने हमेशा सपनों से बड़े होते हैं!!

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