Sunday, August 25, 2013

सपने और अपने

कभी वो नज़रें चुराके हमें आंसुओं से भिगोते हैं ,
कभी अपना दामन चुराके हमें बारिश से भिगोते हैं !

हम तो उनकी यादों के समंदर में न जाने ,
खाते कितने गोते हैं !

खुली आँखों से देखके उनके ख्वाब ,
कभी जागते हैं कभी सोते हैं !

कभी नन्ही आस को उम्मीद के दरिये में डुबोते हैं
और कभी नन्हे सपनों को कोशिशों के बाग़ में बोते हैं !

सारी ख्वाइशों को टूटे खिलोनों सा संजोते हैं
और अपनी बाजुओं की मिटटी के दम में जोते हैं !

चाहत के रंगों से भरे आईने को सच्चाई के पानी से धोते हैं।,
और फिर कड़ी मेहनत की धूप में सुखोते हैं

तुम्हे शायद लगेगा की हम भी तनहाइयों में रोते हैं ,
सपनों के लिए न जाने कितने लोग अपनों को खोते हैं !

पर सच तो ये है ए बेवफा अपने हमेशा सपनों से बड़े होते हैं
अपने हमेशा सपनों से बड़े होते हैं!!

Saturday, August 10, 2013

सच्चा झूठ !

हर ख्वाब पूरा  नहीं होता , हर सपना भी अधूरा नहीं होता !
हर सुरखाब के पर नहीं होते ,हर राही  अपनी राह भी नहीं खोता



समंदर में हर कश्ती को साहिल नहीं मिलता ,
पर हर माझी नाव को मझदार में नहीं डुबोता !

हर उम्मीद कसौटी पर खरी नहीं उतरती ,
पर हर चाहत का फ़साना भी  नहीं बनता !

हर अरमान पर हक मेरा नहीं ,
पर हर कसूर भी तेरा नहीं होता !

कुछ सितम-ए -तकदीर ,कुछ गिले शिकवे ,
हर बात का भी माज़रा नहीं होता !


कुछ महफिलें तन्हाई की ,कुछ जलसे मायूसी के ,
हर शम्मा पे कुर्बान भी परवाना नहीं होता !

हर मरहम जख्म नहीं भरता ,
हर हरा जख्म भी गवारा नहीं होता !

कुछ उदास शामें यादों की बारात की ,
हर शादी के दुल्हे का सेहरा नहीं होता !

हर दरिया दर्द का गहरा नहीं होता ,
और हर गैर  शख्स , अनजान चेहरा नहीं होता !

अकेला निकल सकता था वो और कारवाँ भी बन जाता,
अगर वो तेरे लिए ठहरा नहीं होता , तेरे लिए ठहरा नहीं होता !


Saturday, August 3, 2013

सफ़र उनका बस में ...

वो बस में सफ़र कर रहे हैं ,
और हम उनके बस में Suffer कर रहे हैं...

वो बस में बेखबर सो रहे हैं ,
और यहाँ हम बेसबर हो रहे हैं। ..

वो बस में अपने ख्वाबों से मुखातिब हैं ,
और हम बेबस हैं अपने तसब्बुर से। ..

वो बस में खुद को मस्ती में डुबोए जा रहे हैं,
और हम तनहाइयों की बस्ती में खोये जा रहे हैं। ..

वो देखते हैं बस की खिड़की से फूल खिल रहे हैं रस्ते में ,
और यहाँ जस्बात की दुकान पर एहसास बिक रहे हैं सस्ते मे..

वो खिल रहे है यारों के बीच जैसे गुलाब गुलदस्ते में ,
यहाँ कोरी पड़ी है किताब हमारी यादों के बस्ते में..

वो बढ़ रहे हैं मंजिल की ओर गुल-ए-लश्कर  की तरह ,
यहाँ चुभ रहे हैं लम्हे सीने में नश्तर की तरह। ..




उनकी मौज़ूदगी  ने बना दिया है बस को वादियों सा हसीन
उनकी ग़ैरहाज़िरी ने कर दिया है हमारा सारा आलम ग़मगीन

बस इतनी सी इल्तजा है ए ऊपर वाले ,
उसे मंज़िल तक महफूज़ पहुंचा दे ,

अगर बैठें है वो बस में , तो हमको उसका आखरी "बस स्टॉप" बना दे !!

छोटे बड़े सपने

 जिंदगी की रेल में हम सब अलग अलग स्टेशन से  चढ़े हैं।। निकले हैं अपनी मंज़िल की ओर , सपने कुछ छोटे कुछ बड़े हैं।  रास्ते में अड़चनें हज़ार, और कई...