Saturday, August 3, 2013

सफ़र उनका बस में ...

वो बस में सफ़र कर रहे हैं ,
और हम उनके बस में Suffer कर रहे हैं...

वो बस में बेखबर सो रहे हैं ,
और यहाँ हम बेसबर हो रहे हैं। ..

वो बस में अपने ख्वाबों से मुखातिब हैं ,
और हम बेबस हैं अपने तसब्बुर से। ..

वो बस में खुद को मस्ती में डुबोए जा रहे हैं,
और हम तनहाइयों की बस्ती में खोये जा रहे हैं। ..

वो देखते हैं बस की खिड़की से फूल खिल रहे हैं रस्ते में ,
और यहाँ जस्बात की दुकान पर एहसास बिक रहे हैं सस्ते मे..

वो खिल रहे है यारों के बीच जैसे गुलाब गुलदस्ते में ,
यहाँ कोरी पड़ी है किताब हमारी यादों के बस्ते में..

वो बढ़ रहे हैं मंजिल की ओर गुल-ए-लश्कर  की तरह ,
यहाँ चुभ रहे हैं लम्हे सीने में नश्तर की तरह। ..




उनकी मौज़ूदगी  ने बना दिया है बस को वादियों सा हसीन
उनकी ग़ैरहाज़िरी ने कर दिया है हमारा सारा आलम ग़मगीन

बस इतनी सी इल्तजा है ए ऊपर वाले ,
उसे मंज़िल तक महफूज़ पहुंचा दे ,

अगर बैठें है वो बस में , तो हमको उसका आखरी "बस स्टॉप" बना दे !!

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