Saturday, January 5, 2013

Haan Mai Insanon ke beech rehta hun....

कुछ दिखावटी चेहरे कुछ झूठी मुसकानें ,
कुछ जस्बातों को बेचती  दुकानों के बीच रहता हूँ , हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कभी हँसते हुए कभी रोते हुए ,
अपने में खोये जस्बों के दरिये में बहता हूँ , हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कुछ सुनसान  सड़कें, कुछ चलती फिरती लाशें ,
यहाँ ठन्डे शमशानों के बीच रहता हूँ, हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कुछ वक़्त की मार को, कुछ अपनों के वार को,
कुछ रोती बिलखती चीख पुकार को रात-दिन सहता  हूँ, हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ..

कुछ झूठे वादे कुछ टूटी कसमें ,
कुछ सपनों में फसानों के बीच रहता हूँ, हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कुछ सूनी राहें कुछ गीले दलदल ,
कुछ डरावने वीरानों के बीच रहता हूँ, हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कुछ  गुमनाम रास्ते , कुछ सूखे दरख़्त,
कुछ  खंडहर बने मकानों के बीच रहता हूँ, हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

कुछ बिसरे किस्से कुछ  छुपे राज़ ,
कुछ  कडवी सच्चाईयाँ , मै अपने  मुह से कहता हूँ  हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

हाँ मै  इंसानों के बीच रहता हूँ ...

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