Saturday, January 5, 2013

bebasi

ज़ख्म कुछ हरा सा है, दर्द कुछ भरा सा है,
तूफानों से एहसास मचल रहे हैं, पर कलेजा डरा सा है!

हिमाकत बहुत है पर जोर ज़रा सा है, ख्वाब का सरमाया ज़ेहन में मरा सा है,
सीने में अरमान दफ़न हैं पर ख्वाइशों पे उम्मीद का पहरा सा  है!

आसूओं का समन्दर गहरा सा है ,वजूद अपना खरा सा है ,
आहट सी आह की जुबां पर है, और तसब्बुर ने पहना काटों का सेहरा सा है!

नजर में कोई जाना पहचाना चेहरा सा है, लम्हा कुछ वक़्त में ठहरा सा है,
चश्मा है ज़स्बों का फूटने को, पर  लबों की अज़ान सुनने वाला बहरा सा है!

चाहत है दर्रे दर्रे पर, दरिया और दरख्तों पर , उकेर दूं तेरा नाम अपनी शिद्दत से,
तेरे बिना हर गुज़रा हुआ पल अधूरा सा है, तेरी कशिश से सब कुछ पूरा पूरा सा है,

सब कुछ पूरा पूरा सा है!!


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