Saturday, October 6, 2018

न जाने क्यों....

जगाता हूँ सीने में ढेर सारे अरमान ,
फिर धीरे से इन्हें थपकी देकर सुलाता हूँ ||

जलाता हूँ शम्मे-ऐ- आरज़ू शामों को
फिर चुपचाप सुबह धीरे से फूँककर बुझाता हूँ ||

बोलता हूँ ढेर सारे लव्ज़ तेरी तारीफों में
फिर इन लबों को ऊँगली रखके चुप कराता हूँ ||

सजाता हूँ ढेर सारे सुरीले सपने  तेरे , नींदों में
फिर वास्तविकता में आँखें मलता  जाग जाता हूँ ||

लिखता हूँ हज़ारों नगमे तेरे तोहफों में
फिर लिखके बार बार मिटाता हूँ ||

न जाने क्यों , हर याद में, हर बात में
मेरे हर दिन में मेरी हर रात में

कभी तुझे खोता हूँ , कभी तुझे पाता हूँ
कभी तुझे खोता हूँ , कभी तुझे पाता हूँ||

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